बदलते वक्त में खोती जा रही गांव की शादियों की सामाजिकता


बदलते वक्त में खोती जा रही गांव की शादियों की सामाजिकता

आर के मिश्रा

गांव की शादियां कभी सामाजिकता और अपनत्व का जीवंत उदाहरण हुआ करती थीं। न टेंट हाउस का दिखावा था, न कैटरिंग का खर्चा, न ही डीजे–ऑर्केस्ट्रा का शोर। तब शादी का मतलब केवल दो परिवारों का मिलन ही नहीं, बल्कि पूरे गांव का उत्सव होता था।

जब भी किसी घर में शादी-ब्याह होता, गांव का हर घर सहयोगी बन जाता। कोई चारपाई लेकर आता, तो कोई थाल-लोटा, कराही-कलछुल जुटा देता। गांव की महिलाएं तथा पुरूष एक साथ बैठकर पकवान तैयार करते, गांव घर की महिलाएं दुल्हन को सजातीं और हर रस्म पर पारंपरिक गीत-गारी गातीं।

पुरुष दिनभर बारात की तैयारी में जुटे रहते और लड़के खाना परोसने की जिम्मेदारी संभाल लेते। बारातियों के सम्मान में घराती पहले खाना नहीं खाते थे, क्योंकि यह इज्जत का सवाल माना जाता था।

उस दौर में मनोरंजन का जरिया भी अलग ही था। बड़े घर की शादी में टेप रिकॉर्डर पर बजता गाना – “मैं सेहरा बांधके आऊंगा…” – दूल्हे को युवराज बना देता। नाई समय-समय पर दूल्हे के बाल झाड़ता, चेहरे पर काजल-पाउडर लगाता ताकि उसका रौब बरकरार रहे।

पंडित जी की लंबी पूजा-पाठ, कोहबर की रस्म में दुल्हा-दुल्हन को दो मिनट की मुलाकात, सुबह का कलेवा और उसमें गाई जाने वाली गारी—सबका अपना अलग ही मज़ा था। अक्सर दूल्हा कलेवा खाने से नखरे करता और कन्या पक्ष के लोग उसे मनाने के लिए हंसी-मजाक के साथ रसगुल्ले का कण उसके होठों तक पहुंचा देते।

जूता चोरी की रस्म में दूल्हे को कन्या पक्ष की लड़कियों से मिन्नत करनी पड़ती और कुछ मुद्रा देकर जूता वापस पाना पड़ता। वहीं, वधू पक्ष की महिलाएं दूल्हे का ‘साक्षात्कार’ कर उसे उपहार देतीं और उसकी खूबियों-खामियों पर बाद में चर्चा भी करतीं।

अगले दिन परिचय-संस्कार में गांव के लोगों और रिश्तेदारों से आत्मीय परिचय कराया जाता। यही वह दौर था जब शादी महज दो परिवारों का नहीं, बल्कि पूरे गांव का आयोजन होती थी।

लेकिन अब समय बदल गया है। आज शादियां मैरिज हाल में होती हैं, जहां न तो पड़ोसियों का जुड़ाव रहता है और न ही रिश्तेदारी का गहरा परिचय। वर पक्ष के लोग अक्सर कन्या पक्ष का घर तक नहीं जानते। सामाजिकता और समरसता की जगह अब भव्यता और दिखावे ने ले ली है।कभी गांव की शादियों में गूंजने वाली हंसी-ठिठोली और सामूहिकता अब यादों में सिमटकर रह गई है।


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